बेटी की लिपस्टिक | Beti Ki Lipistik (Poem) - HRITHIK RAI

Beti ki lipistik poem by Hrithik Rai

चांदनी फिल्म आ रही थी टीवी पर
एड के दौरान मै खड़ी हुई और
अपना पर्स थामे बाहर निकल गयी. 
बाहर बड़ा सुंदर और साफ रोड था 
बगल मे फूल पत्तों से सजा गार्डन 
सब एक ही ऊंचाई के झाड़. 
मै कदम तेज कर जोर जोर से 
चलनी लगी 
दुपट्टा फडफडा रहा था जैसे फ़िल्मों मे देखा था. 
फडफडा तो चप्पल भी रहा था 
जो हल्की भीगी रोड के छींटे 
मेरे सलवार के पीछे 
पोल्का डॉट्स के तरह छाप रहा था. 
मैने कोने से मोड़ लिया 
और जा पहुंची शृंगार वाटिका 
जिसमे घुसते ही लगे हुए थे 
लिपस्टिक और नेलपालिश के ढेर 

मै फ्लैशबैक मे चली गयी 
मै फ्लैशबैक मे जाने के लिए ही आई थी. 
ज्यादा साल कहां बीते थे.. 
कुछ ही दिन पहले तक 
मै और मेरी बेटी यहां आया करते थे 
किसी भी छोटे बड़े अवसर त्योहार से पहले 
लिपस्टिक लेने. 
तब जब एक लिपस्टिक होते हुए दूसरा खरीदना
फिजूल खर्च था 
तब जब मै एक हफ्ते पहले से ही 
दुकानदार को बोलके रखती थी 
की अच्छे वाले बेच ना दे सारे.. 
'आऊंगी बेटी के साथ'
तब जब मा बेटी एक आधा घंटा लगाते थे रंग चुनने मे 
और अंत मे वही लाल वाला उठाकर लाते थे. 
फिर घर लाकर उसे पहले वो लगाती 
फिर मै. 
दोनो लगाने के बाद होंठ मलते 
और प्पह की अवाज निकालते 
फिर हम दोनो मैचिंग सारी पहनकर जाते 
फोटो स्टूडियो. 

मैने उसे फोन लगाने का सोचा था 
की बेटी कौन सी रंग की लेकर रखूं 
कौन सी लिपस्टिक खरीदूं जिसे देख 
तुझे कभी वापस जाने का मन ना करे. 
फोन बिजी होने के कारण मेरी बात नही हो पायी 
मैने फिर आधा घंटा टटोला 
फिर आधा घंटा टटोलने की ऐक्टिंग की 
और अंत मे वही लाल वाला उठा लायी. 
उस लिपस्टिक को जाकर मैने उसके टेबल पर रख दिया 
जिसपर वो सजा करती थी 
वो टेबल आज भी है 
बाकी तो सब बदल गया है. 
बच्ची बहुत कामयाब निकली मेरी 
अमेरिका लायक. अब वहीं बस गयी है. 
उसके भेजे रुपयों से नया घर लिया हमने 
नयी गाड़ी नयी साड़ियां नयी जरूरतों का पता चला 
जैसे योगा मैट, जैसे वैक्यूम क्लीनर, जैसे ड्रीम कैचर.. 

वो कल आएगी 
एक साल बाद 
हर साल आती है एक बार 
एक हफ्ते के लिए 
और कहती है की सारी बातें कर लूं उससे 
पर मुझे समझ नही आता की क्या कहूं. 
क्या क्या कहूं.. की.. 
की कैसे उसने एक दिन वो महंगी वाली लिपस्टिक 
की जिद कर ली थी. 
उस दिन मेरे पास बिलकुल पैसे नही थे 
तो उधार ही ले आयी. बहुत खुश हुयी थी वो.. 
स्कूल से आने के बाद लगा लेती थी 
और कभी नही पोंछती थी.. 
कल जब आएगी 
तो लाल लिपस्टिक टेबल पर देखकर 
खुश हो जाएगी. 
और मै उसे देखकर. 
अगले दिन जब घंटी बजी 
और वो दौड़े मुझे गले से लगा ली 
मै रोने लगी और उसने आंसू पोंछे 
उसने कहा 'अब तो मै आ गयी ना' 
पर मै अभी से उदास होने लगी की 
ये चेहरा एक हफ्ते बाद फिर परदेस उड़ जाएगा 
और मै वापस टीवी भरोसे.. 
वो जब कपड़े बदलने बाथरूम गयी 
तब जल्दी से जाकर मैने टीवी को चूमा 
और उसे थैंक्यू बोला. 
अचानक मुझे उससे अपनापन होने लगा. 

मै रो रही थी की मैने उसे 
उसके टेबल की ओर जाते देखा 
और मै उसके पीछे आने लगी क्यूंकि 
मै जानती थी की वो लिपस्टिक देखकर मुझे ही पुकारेगी
और शायद बीते दिनों को याद करके रोयेगी. 
उसने टेबल के आगे बैठकर 
बाल का जूड़ा बनाया 
डीयो मारा और बेड पर हेडफोन डाले कूद पडी. 
मैने जल्दी से टोका 'खाना खाने तो चल' 
'और ये तो देख क्या लाई हूं तेरे लिए' 
और मैने लिपस्टिक उसके हाथों मे धरा.. 

वो चिल्ला कर बोली 
'अब क्यूं गरीबों वाली हरकतें करती हो मम्मी 
ये सब सस्ते सस्ते वैसे भी मै नही लगाती' 
उसने अपने हाथों से उसे झटक दिया 
और लिपस्टिक थोड़ा
 दूर जाकर गिरा 
हालाकि उसने धीरे से झटका था.. 
मै उसे उठाने के लिए झुकी 
तो आंसू फ्लोर पर गिर पड़े 
उन्हें पोंछ कर और लिपस्टिक पकड़कर 
जैसे ही मै उठी 
वो बोली 'जाते जाते गेट लगा देना'.. 
मै वापस उस बड़े से कमरे मे बैठ गयी 
जिस टीवी को हफ्ते भर बाद खुलना था 
उसे खोला और चैनल बदलने लगी.. 
सोच रही थी की जाकर वापस खाने के लिए बोलूँ 
पर हिम्मत नही हुई, क्यूंकि खाना भी 
मैने सस्ता ही बनाया था. 

वो जब अमेरिका थी तब फोन लगाकर
बात कर लिया करती थी मै. 
उसे अमेरिका से तो बुला लिया 
अपने पास कैसे बुलाऊं मै
कौन सा फोन लगाऊं मै. 

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