है, जहाँ जीना कठिन, मरना जहाँ आसान है ..... क्या .... यही हिंदोस्तान है ? - Paramjeet Kaur

poem on riots

पकड़ो,  पकड़ो , .... मारो ,मारो , की आवाज़ों से वह कांप रहा था ।
एकाएक आवाज़ें नजदीक आने लगी । उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।  वह जड़ खड़ा था, तभी 
किसी ने झपट कर उसे खींच लिया और छिपा लिया अपने आँचल में.....
थोड़ी दूर का मंजर  देखकर वह छटपटाने लगा । चीखने  ही वाला था कि मुँह बंद कर 
दिया गया । उसके सामने उसके पिता को खींचते हुए, वे लोग ले गए .... 
कहाँ ...? ....पता नहीं ?
घर जला दिया गया । कुछ समय पहले तक हँसता -खेलता परिवार सड़क पर आ गया ।
एक दिन बाद , वह 7 साल का  बच्चा अपने पिता की लाश के आगे बिलख -बिलख कर रो 
रहा था।
क्यों नोच लिया गया उसका बचपन ?  वक़्त से पहले ही तो उसे बड़ा बना दिया गया था ।
किस कसूर की सजा दी गई थी ?
जो ज़ख्म मिल गए थे , क्या उसके निशान कभी मिट पाएँगे?
क्या तूफ़ान गुजर जाने के बाद, दिये गए मुआवज़ों से, अपने लौट आएँगे?
आदमी ही आदमी को गुमराह करता है और आदमी ही आदमी का शिकार करता है ।
जो मरता है, वह भी अपना था  और  जो मारता है, वह भी अपना ही तो था  !
जैसे इंसान के भेष में गिद्ध   ,   इंसानों को नोच रहे हैं .....
आज उनका पलड़ा भारी था , कल इनका होगा ।
इतिहास साक्षी है कि हर बार सत्ता धारी अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए शतरंज 
की बिसात बिछाते हैं,चालें चली जाती है ... लेकिन मोहरा बनता है तो केवल ‘आम 
आदमी’
वही आम आदमी, जो चुनाव के दिन सबसे शक्तिशाली होता है , मगर बाकि दिन उस की 
औकात भेड़- बकरी से ज़्यादा नहीं होती ।
इंसानियत को शर्मसार करती ऐसी घटनाएँ आखिर कब बंद होंगी?
जो गुमराह हो चुके हैं , आख़िर लौट कर वे भी घर ही तो आएँगे ।
क्यों नहीं हम स्वार्थ की मानसिकता को छोड़ कर स्वस्थ सोच का विकास करते ?
क्या मुश्किल है ...! ऐसी सोच का विकास जो गलत और सही की पहचान करा सके?
किताबी ज्ञान तो हासिल कर लिया , अब ज़रा जीवन मूल्य भी अपनाएँ….
भटकती नौजवान पीढ़ी की सोच को सही राह दिखलाएँ,
बहुत जरूरी है ये समझना,
विकास बाँटने में नहीं , मिलकर आगे बढ्ने से ही संभव है ।


परमजीत कौर
29.02.2020

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