इश्क़ - विजय शंकर प्रसाद - Man Ke Taar (Kavita Sangrah)

Man ke Taar Ishq इश्क़  विजय शंकर प्रसाद

कभी इंतजार खत्म नहीं ,
अभी इजहार रस्म यहीं ।
बंदिशें गहरी बहरी नहीं,
शीशे बड़ी मेरी कहीं ।

लोभ में चला दूर,
क्षोभ में मैला दस्तूर ।
जश्न का बाजार गर्म,
यत्न का संसार शर्म ।
इश्क़ यूं बदनाम किया,
अश्क छू अंजाम दिया ।

कल तक बदरंग नदी,
बादल सरक संग -संग सदी ।
प्यासी मीन याद है,
सन्यासी दुर्दिन संवाद है ।
संभलना सबका काम है,
चलना तय मुकाम है ।

राम तो सुंदर भला,
नाम में मनोहर कला ।
मन मंदिर तन अधीन,
स्वप्न फिर नयन यकीन ।
काली रात भींगी बात,
ताली ज्ञात और अज्ञात ।
छोड़ प्रेरित नाहक चाल,
गठजोड़ उचित प्रेरक ढाल ।

नाव पार कहां साहिल,
छांव यार कहां मंज़िल ?
कोरा कागज गुलाबी कलम,
गरल ऊपज मचाया ऊधम ।
आखिरी वादा भी बेनकाब,
महफ़िल ,अदा , जवाब हिसाब ।

परछाई हमसफ़र तक समझाया,
कुछ खोकर ही पाया ।
कुछ अपनी आदत लाचारी,
खुदगर्जी नहीं कहीं खजुली ।
पुरानी किताब पर शब्द,
रानी रूआब नहीं सर्द ।

कुछ ख्याति अर्जित घट-घट,
कुछ अति वर्जित पनघट ।
सच पूर्ति घटित अदालत ,
न्याय सृष्टि हित प्रदत्त ।

गड्ढा सड़क जीवन नर्क,
दाग़ भड़क दीदार कुचक्र ।
न कह सके हम जन्नत,
न सह सके बेरहम दावत ।
हर ओर टपक मेंढक,
तौल गया लपक धकाधक ।

नग्न वह बदला रंग,
हरी घास पर मतंग ।
प्रात को आने दो ,
रात अब जाने दो ।
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विजय शंकर प्रसाद
www.facebook.com/vijayshankar.prasad.3386

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