लोगों को अब हंसने दो हमको भी अब चलने दो - मन के तार

logon ko ab hasne do humko bhi ab chalne do mun ke taar

 काल कर्म गुन ज्ञान
नियति के प्रहरी बनकर 
प्रति कल्पित उच्वास 
शाम के उर में ढलकर 

रोक सकेगा कौन 
घटी सामर्थ्य सकती से 
केवल आशा शेष 
नहीं है सक्षम अभ्यन्तर 
केवल दिशाहीन है दौड़ 

नही मिल रहा मन चाहा और
और कहते कहदो यही सही है 
गति की धीमी धार रही है 

कब रुक जाएँ कह नहीं सकते 
लोग बिना मतलब हैं हँसते 
लोगों को अब हंसने दो 
हमको भी अब चलने दो
-----<>-----
प्रताप नारायण पांडेय 
ग़ज़िआबाद

टिप्पणी पोस्ट करें

1 टिप्पणियां